Friday, March 24, 2017

Two short poems


बेक़रारी सी बेक़रारी है, वस्ल है और फ़िराक़ तारी है
जो गुज़ारी न जा सकी हमसे, हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है

- Jon Elia


(1)

She will have no more
of his impatience.
If he really loved her, 
he needed to learn to wait. 
Wait how much? he asked. 
A lifetime, she said proudly.
He waited.
A lifetime.

[April 2014, Princeton]

(2)

You told me, politely,
to go away.
I did.

[June 2009, New Delhi]

Saturday, March 18, 2017

छोड़ो भी

जब हम में था क़रार, मिलती थी हफ्ते एक बार
अब  जो कुछ भी न रहा, अब क्यों रोज़ आती हो?

अब तो फ़िराक को भी गए हो चली हैं मुददतें
ये कोई सलात तो नहीं जो सुभ-ओ-शाम गाती हो !

शब भर मुस्कुरा के कहती हो माफ़ किया छोड़ो भी
आँख खुलते ही मगर पल में चली जाती हो।

Thursday, March 2, 2017

No non-sense man